Arthla | Sangram sindhu Gatha

Arthla Part - 2
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“दो शब्द”

यह कथा किसी पुराण में नहीं मिलेगी । यह मेरी कथा है । मैं आपको कोई लोकप्रचलित इतिहास बताने नहीं जा रहा । मैं आपको, अपनी कल्पना के धरातल पर खड़ा करना चाहता हूँ । वह कल्पना जो मुझे प्रेरित करती है, उत्तेजित करती है, नई सुगंध देती है और इस संसार को देखने का एक विस्तृत, निष्पक्ष और सुन्दर दृष्टिकोण सौंपती है ।

इस कथा में मैंने वही संसार रचा है जो मेरे आस-पास प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चलता है, मात्र कालखंड परिवर्तित किया है । यह वह कालखंड था जिसमें मेरी कल्पना के विस्तार के लिए पर्याप्त अवसर थे । मनुष्य युगों पूर्व का हो या वर्तमान का, मानवीय गुण-धर्म में कुछ अधिक परिवर्तन नहीं हुआ है ।

देव, असुर, दानव, दैत्य और राक्षस जैसे मिथकीय पात्रों की रोमांचक कल्पनाएँ मैं बचपन से ही किया करता था । जब कुछ बड़ा हुआ, कुछ ज्ञान बढ़ा, तब उनकी मुखाकृति और रंग-रूप से आगे बढ़ते हुये उनके समाज, विचार, व्यवहार, आपसी संबंध और युद्धशास्त्र के विषय में तार्किक गणना करने लगा । कल्पना को मैं इस सृष्टि की सबसे बड़ी ऊर्जा मानता हूँ । इसी कल्पना के धरातल को पीढ़ी-दर-पीढ़ी ठोस करते हुये मानव सभ्यता आज इस विकास चिन्ह को छू पायी है ।

मेरे मन में भी इसी कल्पना ने एक युग के धरातल का निर्माण किया । उनकी सभ्यता, संस्कृति और समाज का ढांचा खड़ा किया । पूर्व युगीन पात्रों को बनाया और उनके आपसी संबंधो को जोड़ा ।

यह किसी नायक की जीवन यात्रा नहीं है । यह एक सम्पूर्ण युग की वीर-गाथा है । इस गाथा के विषय में मैं आपको इस पृष्ठ पर कुछ विशेष नहीं बताऊंगा । वास्तव में, मैं आपको अपनी गाथा सुनाने के लिए अति उत्साही हूँ । इसे रचते समय जितना मैंने सीखा और रोमांचित हुआ, आशा करता हूँ आप उससे अधिक ग्रहण करेंगे ।

एक अकल्पित युग की यात्रा के लिए आमंत्रित करता हूँ  |

~ विवेक कुमार


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